Ishwar ek Jigyasa

इश्वर क्या है कहाँ रहते हैं हमे दिखाई क्यूँ नहीं देते ?
यह प्रश्न तो सभी के मन मैं उठता ही होगा | अगर हम थोड़ी गहराई से सोचे तो लगता है कि यह इतना बड़ा संसार ऐसे ही तो नहीं चलता कोई तोह इसी शक्ति है जिसके वश मैं सारा जगत भली भाति चलता है | उस शक्ति को हम भगवान् , इश्वर, परमात्मा किसी भी नाम इसे जान सकते हैं
हम मनुष्य माया , मोह , स्वार्थ , लालच और अन्धविश्वासो से इतना डूबे हुए हैं हम कुछ समझ ही नहीं पाते कि क्या सच है और क्या झूट | एक तरफ तो कहा जाता है आत्मा परमात्मा का अंश है तो इश्वर तो हमारे अन्दर ही है | दूसरी तरफ पत्थर की मूर्तियाँ बना कर उसे ही भगवान् मान कर पूजते हैं | हम कहते हैं कि इश्वर एक है पर मानते नहीं है | भिन भिन रूपों को इश्वर मानकर पूजते रहतें हैं | चन्दन , रोली , फूलमाला पैसा चढ़ा कर निश्चिन्त हो जाते हैं
इश्वर भगवान् सभी परमात्मा के स्वरुप है यह हमे बताता है हमारा ज्ञान , सत्संग | ज्ञान कौन देता है , हमे अंधविश्वास से कौन निकालता है | वोह है सद्गुरु , सच्चे संत महात्मा , जो हमे बताते हैं परमात्मा कहाँ रहते है |
उदाहरण – जैसे कस्तूरी मृग के अन्दर ही रहती है लेकिन वह उसकी खोज मैं इधर उधर भटकते ही रहता है | ठीक वैसे ही परमात्मा आत्मा के रूप मैं हमारे अन्दर ही है बस हमे उन तक पहुचने का मार्ग जानना है | हमारी आत्मा जो परमात्मा का स्वरुप है अगर हमारे शरीर से निकल जाए तो सब कुछ शुन्य हो जाता है |
भीतर शुन्य बाहार शुन्य , शुन्य चारों ओर है ,
मैं नहीं हूँ मुझमे , फिर भी “मैं , मैं ” का ही शोर है |
पूरी जिन्दगी लगा देते हैं , चाबी पाने मैं ..
अंत मैं पता चलता है कि ताला तो क्या दरवाजा भी नहीं हैं परमात्मा तक पहुँचने के लिये | हम उनकी तरफ कदम बढाते हैं तो , मार्ग तो अपने आप वो बना देते हैं , पर हमारे कदमो मैं , हमारी पुकार मैं सच्ची श्रधा , प्रेम , भक्ति होनी चाहिए | परमात्मा तो अंतरयामी है | वोह कहतें हिना कि “तू होजा मेरा तो जग करदूं तेरा ”
बड़े बड़े ग्रन्थ भी यही कहते हैं कि सिफ सच्चे मन से अगर परमात्मा को याद किया जाए तो परमात्मा तो दयालु है सब कुछ भूलकर हमे अपना लेतें हैं और हमे अपने आप से , हमे अपने अन्दर ही अपना स्वरुप दिखा देते हैं | पर उन्हें जानने , देखने के लिये सच्ची लगन चाहिए | अंततः यही कहना चाहूंगी कि परमात्मा एक शक्ति के रूप मैं हमारे अन्दर ही आत्मा के रूप निहित है |मेरे विच्चारों की , सोच की यह सिर्फ एक कोशिश है |धन्यवाद
मंजू माधोगारिया .
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